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जोनाई , निज संवाददाता, 22 जुलाई :---
देश के लिए यह दिन सचमुच ऐतिहासिक दिन है। श्रीमती द्रौपदी जी मुर्मू ने प्रचंड वोट प्राप्त कर भारत की 15 वी राष्ट्रपति चुनी गई है। श्रीमती मुर्मू के रूप में पहली जनजाति व्यक्ति आज भारत की प्रथम नागरिक बनकर राष्ट्रपति भवन में शानदार प्रवेश करने के लिए तैयार है। 
आज का यह दिवस केवल इस देश के 12 करोड़ से ज्यादा जनजाति समाज के लिए ही नहीं, तो संपूर्ण भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखने लायक दिन है। संपूर्ण देशवासियों का सर आज गर्व के साथ ऊंचा हुआ है। भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में एक जनजाति व्यक्ति का देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना, देश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटना मानी मानी जाएगी। 
एक गौरवशाली परंपरा, संस्कृति के साथ-साथ एक संस्कारी जीवन जीने वाला इस देश का एक बड़ा घटक होने के बावजूद भी जो समाज पिछड़ा, अंधश्रद्धा के आधीन, व्यसनाधिन का ठप्पा लगाकर सालों साल उपेक्षा का जबरदस्त शिकार हुआ, ऐसे समाज की एक व्यक्ति, वह भी एक महिला देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच गई है, यह देश के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए। ७५ साल देरी से ही क्यों ना हो, जनजाति समाज को उसका हिस्सा, उसकी भागीदारी देने वाले एक उचित कदम के रूप में इस घटना को हमे देखना चाहिए। 
यह बात सही है कि जनजाति समाज के बारे में आज भी संपूर्ण देश में जो गलत प्रतिमा बनी हुई है, उस प्रतिमा से अपने ही समाज के इस बड़े घटक को बाहर लाने की आवश्यकता थी। दुर्भाग्य से जनजाति समाज के आक्रोश को इस देश ने कभी समझा ही नहीं। ना जनजाति समाज कि इतनी बड़ी आवाज थी और ना उनका नेतृत्व था, जो उनकी आवाज समाज तक पहुंचाएं। विश्वास रखेंगे या अवसर मिलेगा तो हम अधिक गति से प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकते है, ऐसे कई उदाहरण जनजाति समाज ने देशवासियों के सामने प्रस्तुत किए। चाहे वह राजनीति में हो, सामाजिक क्षेत्र में हो या खेल के क्षेत्र में हो। जनजाति समाज ने हमेशा ही अपने टैलेंट को सिद्ध कर इस देश का गौरव बढ़ाया है।  
जिस विकृत मानसिकता से अंग्रेजों ने जनजाति समाज की ओर देखा उसी दृष्टिकोन को स्वतंत्र भारत में भी चलाया गया। बिरसा मुंडा, टंट्या मामा, रानी गाइदिनल्यू, रानी दुर्गावती, राघोजी भांगरे जैसे सैकड़ों वीर क्रांतिकारी जिस समाज में निर्माण हुए और जिन्होंने भारत को अंग्रेजों की दास्यता से मुक्त कराने के लिए अपनी जिंदगी खफा दी, ऐसा समाज पिछड़ा कैसे हो सकता है?
देश के लिए इससे बड़ा स्वर्णक्षण हो सकता है?* 
दुर्भाग्य से अंग्रेजों की नीतियां ही स्वतंत्र भारत में भी चलाई जाने के कारण आज भी जनजाति समाज उसी प्रतिमा के संघर्ष में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। द्रौपदी जी का राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होना जनजाति समाज अपनी प्रस्थापित प्रतिमा से बाहर आने की दृष्टि से एक अच्छा संकेत माना जाना चाहिए। वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने एक जनजाति महिला को जिस विश्वास के साथ राष्ट्रपति पद पर बिठाया है वह एक स्वागत योग्य कदम माना जाएगा। 
सभी दलों का समर्थन प्राप्त कर द्रौपदी जी अगर निर्विरोध चुनी जाती तो यह अच्छा होता, लेकिन फिर भी जो स्नेह एवं प्रेम द्रौपदी जी को प्राप्त हुआ है वह बदलते वर्तमान का एक परिचायक माना जाना चाहिए। सालों साल से इस देश का जो जो समाज घटक उपेक्षा, अन्याय का शिकार हुआ, ऐसे समाज को अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देने के प्रयास वर्तमान सरकार ने प्रारंभ किए हैं। जिससे एक समरसता युक्त वातावरण निर्माण होकर यह देश और तीव्र गति से प्रगति की ओर अग्रसर होगा ऐसी सब की अपेक्षा है।
द्रौपदी जी जिस जनजाति समाज से आती है, वह लगभग 12 करोड का जनजाति समाज आज भी विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है। मूलभूत व्यवस्थाओं का भी इस संपूर्ण क्षेत्र में आज भी पूर्णत: अभाव दिख रहा है। देश के सर्वोच्च प्रमुख के नाते इस समाज की समस्याओं की तरफ विशेष ध्यान देने की द्रौपदी जी से अपेक्षा है। विभिन्न अराष्ट्रीय गतिविधियों ने जिस प्रकार से जनजाति समाज का उपयोग कर उनको इस देश के खिलाफ खड़े करने के प्रयास किए उन प्रयासों को भी विफल करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस दृष्टि से जनजाति समाज समस्याओं के मूल कारणों को ढूंढने का प्रयास भी उन्हें करना होगा। 
इस देश की राष्ट्रपति के नाते आने वाले कुछ वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण निर्णयोंका भागीदार बनने का सौभाग्य द्रोपदी जी  को मिल रहा है। अपने व्यक्तिगत जीवन में सभी प्रकार के संघर्षों का सामना कर द्रौपदी जी ने जिस प्रकार अपने को सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में स्थापित किया, उस अनुभव के आधार पर राष्ट्रपति के नाते इस देश के एकता और अखंडता के लिए भी वह अपना सर्वोच्च योगदान देगी ऐसा सभी देशवासियों को विश्वास है।
आखिर द्रौपदी जी मुर्मू जैसी जनजाति व्यक्ति का स्वतंत्रता के 75 वर्ष में राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होना इससे और अधिक देश के लिए स्वर्णक्षण और सौभाग्य क्या हो सकता है?

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